इजरायल की राजनीति में सत्ता को लेकर घमासान तेज हो गया है। हाल ही में हुए आम चुनाव में रिकॉर्ड 19 सीटें जीतने वाले अरब राजनीतिक दलों ने विपक्षी नेता गादी आइजेनकोट के गठबंधन को समर्थन देने के संकेत दिए हैं। इस समर्थन से आइजेनकोट के सरकार बनाने की कोशिशों को मजबूती मिल सकती है, जबकि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के दोबारा सत्ता में लौटने की राह कठिन हो गई है।
चुनाव में किसी भी गठबंधन को संसद में बहुमत नहीं मिला है। इजरायल की 120 सदस्यीय संसद (नेसेट) में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की जरूरत है। नेतन्याहू की लिकुड पार्टी के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं, जबकि पूर्व सैन्य प्रमुख आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 48 सीटों पर जीत मिली है।
ऐसे में अरब दलों की भूमिका निर्णायक हो गई है। अरब नेतृत्व वाले ज्वाइंट लिस्ट को 11 और मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली राम पार्टी को आठ सीटें मिली हैं। इस बार अरब मतदाताओं की भागीदारी भी बढ़कर करीब 80 प्रतिशत पहुंच गई, जो पिछले चुनाव की तुलना में लगभग दोगुनी है।
विपक्षी गठबंधन ने पहले ही नेतन्याहू के साथ सरकार बनाने से इनकार कर दिया है। विपक्ष का आरोप है कि सात अक्टूबर 2023 को हमास के हमले से पहले सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर चूक हुई थी। इसके अलावा नेतन्याहू भ्रष्टाचार के मुकदमे का भी सामना कर रहे हैं।
हालांकि, अरब दलों का समर्थन लेना आइजेनकोट के लिए आसान नहीं होगा। विपक्षी नेताओं ने पहले अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने से दूरी बनाई थी। उन्हें आशंका थी कि इससे यहूदी मतदाताओं के बीच उनकी राजनीतिक स्थिति प्रभावित हो सकती है। लेकिन अब बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए उन्हें अरब दलों के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है।
नेतन्याहू ने इस संभावित गठबंधन का विरोध शुरू कर दिया है। उन्होंने अरब दलों पर विदेशी समर्थन से चुनाव में धांधली करने के आरोप लगाए हैं, हालांकि इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया है। उनकी लिकुड पार्टी ने अरब दलों के साथ सहयोग को इजरायल के लिए खतरनाक बताया है। वहीं, चुनाव अधिकारियों का कहना है कि कथित अनियमितताओं से पूरे चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित नहीं हुई है।
दूसरी ओर, अरब दलों ने विपक्ष को समर्थन देने की इच्छा जताई है। ज्वाइंट लिस्ट के नेता यूसुफ जबरीन ने स्पष्ट किया है कि उनकी पार्टी संसद में आइजेनकोट के गठबंधन का साथ दे सकती है, लेकिन सरकार में शामिल नहीं होगी। उनका कहना है कि उनकी प्राथमिकता नेतन्याहू और दक्षिणपंथी नेताओं इतामार बेन-ग्विर तथा बेजालेल स्मोट्रिच को सत्ता से बाहर करना है।
राम पार्टी के नेता मंसूर अब्बास ने हालांकि सरकार में शामिल होने का विकल्प खुला रखा है। माना जा रहा है कि इसके लिए उनकी पार्टी आंतरिक सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय की मांग कर सकती है।
विपक्ष ने अरब दलों के साथ किसी भी तरह के सहयोग के लिए कुछ शर्तें भी रखी हैं। इनमें इजरायल को यहूदी राष्ट्र के रूप में स्वीकार करना, सैन्य सेवा का समर्थन करना और हमास की निंदा करना शामिल है। हालांकि, ज्वाइंट लिस्ट का कहना है कि संसद में बाहर से समर्थन देने के लिए इन शर्तों को स्वीकार करना या सरकार में शामिल होना जरूरी नहीं है।
इजरायल की कुल आबादी में अरब नागरिकों की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत है, लेकिन लंबे समय से वे राष्ट्रीय राजनीति में हाशिये पर रहे हैं। गाजा युद्ध के बाद उनकी राजनीतिक मुश्किलें और बढ़ी हैं। गाजा में इजरायली सैन्य कार्रवाई और वेस्ट बैंक पर कब्जे की आलोचना करने वाले कई फिलिस्तीनी राजनीतिक प्रतिनिधियों को गिरफ्तार भी किया गया है।
चुनाव परिणामों को बुधवार को आधिकारिक रूप से प्रमाणित किया जाएगा। इसके बाद राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग संसद में चुने गए 11 दलों के नेताओं से चर्चा करेंगे और उस नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे, जिसे बहुमत जुटाने में सक्षम माना जाएगा। इसके लिए 28 दिन का समय मिलेगा, जिसे जरूरत पड़ने पर 14 दिन और बढ़ाया जा सकता है।
इस बीच, नवनिर्वाचित सांसदों का शपथ ग्रहण 10 नवंबर को होना है। ऐसे में इजरायल की राजनीति में आने वाले कुछ दिन बेहद अहम होंगे। अरब दलों के समर्थन ने सत्ता की लड़ाई को नया मोड़ दे दिया है। हालांकि, आइजेनकोट इस समर्थन को स्थायी सरकार में बदल पाएंगे या नहीं, यह गठबंधन की बातचीत और दोनों पक्षों के बीच होने वाले समझौतों पर निर्भर करेगा।
For clarifications/queries, please contact Public Talk of India at:
+91-98119 03979 publictalkofindia@gmail.com
![]()
For clarifications/queries,
please contact Public Talk of India at:

